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Baudh kalin shiksha ki visheshtaen likhiye |up dled second semester

बौद्ध कालीन शिक्षा की विशेषताएं बताइए /up dled second semester




📝 ✨ 5 Marks Answer (संक्षिप्त उत्तर)

प्रश्न: बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर:

बौद्धकालीन शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं—

  1. शिक्षा का मुख्य केंद्र संघ (विहार) था।
  2. छात्रों का जीवन अनुशासित होता था और वे गुरु की सेवा करते थे।
  3. गुरु-शिष्य संबंध मधुर एवं निकट होते थे।
  4. शिक्षा मौखिक पद्धति से दी जाती थी (सुनना, याद करना, चर्चा)।
  5. वाद-विवाद एवं प्रश्नोत्तर का महत्व था।
  6. शिक्षा निःशुल्क होती थी।
  7. स्त्रियों को भी बाद में शिक्षा का अवसर मिला।

👉 इस प्रकार बौद्धकालीन शिक्षा में नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक विकास पर जोर दिया जाता था।

📝 ✨ 10 Marks Answer (विस्तृत उत्तर)

प्रश्न: बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

बौद्धकालीन शिक्षा प्रणाली अत्यंत विकसित एवं अनुशासित थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

संघ व्यवस्था:

शिक्षा का मुख्य केंद्र संघ (मठ/विहार) था। संघ में प्रवेश को प्रव्रज्या कहा जाता था।

छात्र जीवन:

छात्र अनुशासित जीवन जीते थे और गुरु की सेवा करते थे, जैसे भोजन बनाना, सफाई करना आदि।

गुरु-शिष्य संबंध:

गुरु और शिष्य के बीच घनिष्ठ संबंध होते थे। गुरु शिष्य के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देता था।

मठ व्यवस्था:

शिक्षा मठों में दी जाती थी जहाँ गुरु और शिष्य साथ रहते थे।

अध्ययन पद्धति:

शिक्षा मौखिक थी। सुनना, याद करना, वाद-विवाद और प्रश्नोत्तर प्रमुख तरीके थे।

स्त्री शिक्षा:

प्रारंभ में स्त्रियों को शिक्षा नहीं मिलती थी, लेकिन बाद में उन्हें भी प्रवेश दिया गया।

जनसाधारण की शिक्षा:

आम जनता को भी शिक्षा दी जाती थी और यह निःशुल्क होती थी।

शिक्षा की आयु:

शिक्षा प्रारंभ करने की न्यूनतम आयु 8 वर्ष थी।

अध्ययन अवधि:

शिक्षा लगभग 12 वर्ष तक चलती थी तथा उच्च शिक्षा (उपसम्पदा) भी दी जाती थी।

विषय:

संस्कृत, न्याय, चिकित्सा, दर्शन, तर्कशास्त्र एवं धर्म प्रमुख विषय थे।



 अगर आप भी इस प्रश्न को पूरी डिटेल के साथ लिखना चाहते हैं तो नीचे इस प्रश्न का डिटेल्स के साथ उत्तर दिया गया है ।


✅ बौद्धकालीन शिक्षा की विशेषताएँ (Simple Explanation)

1. संघ (Sangh) – मुख्य शिक्षा केंद्र

  • बौद्ध शिक्षा का मुख्य स्थान संघ (मठ/विहार) था।
  • जो व्यक्ति संघ में प्रवेश करता था, उसे श्रवण (भिक्षु) बनना पड़ता था।
  • बाहर के लोगों को शिक्षा नहीं मिलती थी।
  • प्रवेश के नियम होते थे, जिसे प्रव्रज्या कहते थे (अर्थ: घर छोड़ना)।

2. छात्र की दिनचर्या

  • छात्र (भिक्षु) का जीवन बहुत अनुशासित होता था।
  • वे गुरु की सेवा करते थे –
  • खाना बनाना
  • सफाई करना
  • भिक्षा माँगने जाना
  • सभी काम खुद करने पड़ते थे (कोई नौकर नहीं)।

3. गुरु-शिष्य संबंध

  • गुरु और शिष्य का संबंध बहुत अच्छा और नजदीकी होता था।
  • गुरु शिष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास पर ध्यान देता था।
  • अगर शिष्य गलत होता या पढ़ाई में ध्यान नहीं देता, तो उसे निकाल भी दिया जाता था।

4. मठ (विहार) व्यवस्था

  • शिक्षा मठों (विहारों) में होती थी।
  • गुरु और शिष्य साथ रहते थे।
  • कुछ गुरु एक से अधिक शिष्य भी रखते थे।
  • सामान्यतः पेड़ों के नीचे रहते थे, लेकिन खराब मौसम में मठों में रहते थे।

5. अध्ययन पद्धति (Teaching Method)

  • पढ़ाई का तरीका मौखिक (oral) था।
  • छात्र:
  • सुनते थे
  • याद करते थे
  • आपस में चर्चा करते थे
  • वाद-विवाद, प्रश्नोत्तर भी होते थे।
  • ध्यान (meditation) और मनन से ज्ञान बढ़ाया जाता था।

6. स्त्री शिक्षा

  • शुरू में महिलाओं को संघ में प्रवेश नहीं दिया गया।
  • बाद में महिलाओं को अनुमति मिली, लेकिन कड़े नियम थे।

7. जनसाधारण की शिक्षा

  • आम लोगों को भी शिक्षा दी जाती थी।
  • गुरु घर-घर जाकर शिक्षा देते थे।
  • शिक्षा निःशुल्क (free) होती थी।
  • 8. शिक्षा शुरू करने की आयु
  • शिक्षा शुरू करने की न्यूनतम आयु 8 वर्ष थी।
  • बालक अपनी पसंद से गुरु चुन सकता था।

9. अध्ययन की अवधि

  • प्रव्रज्या संस्कार: 8 वर्ष की आयु में
  • शिक्षा अवधि: लगभग 12 वर्ष
  • उपसम्पदा (उच्च स्तर): लगभग 10 वर्ष

10. अध्ययन के विषय

शिक्षा पूरी तरह धार्मिक नहीं थी, कुछ लौकिक विषय भी थे।

मुख्य विषय:

  • संस्कृत साहित्य
  • न्यायशास्त्र
  • चिकित्सा
  • दर्शन
  • तर्कशास्त्र
  • धर्म


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