Jiwaji University bsc 2nd Year Foundation course Open Book Paper Solution

Jiwaji University bsc 2nd Year Foundation course Open Book Paper Solution

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प्रश्न - तोड़ती पत्थर कविता का सारांश अपने शब्दों में लिखिए

उत्तर - निराला जी ने इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ने वाली श्रमिक महिला का मार्मिक चित्र की शिकार पूंजीवादी व्यवस्था पर हथौड़ी का प्रहार किया है। कवि मजदूरी नी की दशा का चित्रण करते हुए कहता है कि मजदूर अपने उधर पोषण के लिए पत्थर तोड़ने जैसा कठोरतम वाला कार्य कर रही थी। मैंने उसे इलाहाबाद के मार्ग पर पत्थर तोड़ते हुए देखा था। पर पत्थर तोड़ने जैसे कठोरतम वाले कार्य को स्वयं स्वीकार करके जिस स्थान पर वेट कर पत्थर तोड़ने का कार्य कर रहे थे वहां कोई छायादार वृक्ष ना था जिसके नीचे बैठकर वह अपनी गर्मी को दूर कर लेती। इस प्रकार का वातावरण उसके कठोर कार्य को और अधिक कष्टदायक बना रहा था ।

   कठोर श्रम करने के कारण उसका शरीर श्यामला पड़ गया था किंतु हुआ है कि योवन  से भरपूर और संगठित था ,परंतु उसकी आंखें झुकी हुई थी और उसका मन यह प्रिय को प्रसन्न करने वाले कार्यों में लगा हुआ था। उसकी कोमल हाथों में भारी हथोड़ा था जिससे वह पूरी शक्ति के साथ बार-बार पत्थरों पर चोट करती हुई पत्थर तोड़ रही थी। यघपि उसके सामने  कुछ दूरी पर वृक्षों की कतार से गिरी हुई उट्टालिकायें और ऊंचे ऊंचे महल थे। कवि के कहने का आशय यह है कि  मजदूरिन नारी गुणों  से भरपूर थी किंतु भूखे पेट क समस्या ने उसे लाचार बना दिया था। इस लाचारी और मालिक की शोषण के कारण ही उसकी आंखें नीचे झुकी हुई थी अपनी बेबसी और लज्जा शीलता को प्रकट कर रही थी। पत्थरों पर पढ़ती हुई या हठोड़ो की चोटे यह भाव अभिव्यक्त कर रही थी कि, यह चोटे पत्थरों पर नहीं अपितु समाज की पूंजीवादी व्यवस्था पर प्रहार है। मजदूरों ने के सामने दिखाई देने वाले वृक्षों की कतार से गिरी हुई  और ऊंचे महलों का निरूपण करके कवि ने समाज में पूंजीवादी वर्ग और गरीब के बीच व्यापार को प्रतिपादित किया है। कभी यह कहना चाहता है कि आज समाज में एक और पूंजीवादी वर्ग वैभवशाली जीवन व्यतीत कर रहा है तो दूसरी ओर चमक और सर्वाहारी वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाला यह मजदूर भी नहीं जीवन जी रही है। यह समाज के लिए अभिशाप है ।



 प्रश्न -इंद्रधनुष बनने की प्रक्रिया समझाइए

उत्तर - हमारी पृथ्वी सूर्य की तुलना में लगभग 3 लाख 33 गुना छोटी है तथा यह सूर्य से लगभग 15 किलोमीटर दूर भी स्थित है अतः सूर्य का प्रकाश पृथ्वी पर हमेशा लगभग समांतर किरणों के रुप में पहुंचता है।सामान्यता यह करणे जल - बूँदो में प्रवेश करने के पश्चात विचलित होकर बाहर निकल जाती है।लेकिन जल बूँदों  से बाहर निकलते समय वहां पूर्ण आंतरिक परावर्तन की एक अन्य संभावना भी मौजूद रहती है क्योंकि जल के अंदर पहुंचा प्रकाश सघन माध्यम से बूँद के बहार उपस्थित विरल माध्यम की ओर आपतित होता है ।

हर रंग के प्रकाश के लिए पूर्ण आंतरिक परावर्तन मिलने की शर्त अलग-अलग होती है। अतः जब एक रंग के प्रकाश के लिए पूर्ण परावर्तन की शर्त पूरी होती है तब उस रंग का प्रकाश जल गुणों से सीधे अपवर्तित होकर बाहर निकलने की वजह पुनः जल बूँद में ही परावर्तित होकर उससे बाहर निकल आता है ।इस तरह जल बूंदों से अलग-अलग रंगों के प्रकाश को आंतरिक परावर्तन होने के कारण इंद्रधनुष बनने लगते हैं ।



प्रश्न शिकागो व्याख्यान में स्वामी विवेकानंद ने क्या संदेश दिया था? 300 शब्दों में लिखिए

उत्तर-  शिकागो व्याख्यान का संदेश यही है कि सांप्रदायिकता ,हठधर्मिता और उनकी वीभत्स वंशधर धर्मांधता  ने इस सुंदर पृथ्वी की कई सभ्यताओं को विध्वंस किया है इसलिए इस सत्य को समर्थन पर किस प्रकार भिन्न भिन्न ने नदियों से निकलकर सागर में मिल जाता है उसी प्रकार सभी धर्मों के अपने-अपने नियम सिद्धांत होने के बावजूद भी उनमें  सम सुरता हो ।कोई भी धर्म दूसरे धर्म का विनाश या विपक्ष का नेता ना सोचते हुए दूसरों के सार भाग को आत्मसात करें। इस धर्म महासभा ने जगत के समक्ष यह सिद्ध कर दिया है कि शुद्धता पवित्रता और दया शीलता किसी संप्रदाय विशेष की एकांतिक संपत्ति नहीं है। प्रत्येक धर्म में श्रेष्ठ एवं उन्नत चरित्र स्त्री पुरुष है। कोई यह नहीं सोच सकता कि केवल उसका धर्म जीवित रहेगा बाकी धर्म नष्ट हो जाएंगे क्योंकि शीघ्र ही सारे प्रतिरोध के बावजूद प्रदेश धर्म की पताका पर यह लिखा रहेगा ।

''सहायता करो ,लड़ो मत ,परभाव - ग्रहण ना कि परभाव - विनाश' समन्वय और शांति ना की मतभेद और कलह ।''


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